|
| |
| |
श्लोक 13.85.32-33  |
किमर्थं तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते।
प्रीतस्तेऽहं महाभागे तपसानेन शोभने॥ ३२॥
वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर॥ ३३॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे सती-साध्वी देवि! आप यह घोर तप क्यों करती हैं? सुन्दरी! हे महाभाग! मैं आपकी तपस्या से अत्यन्त संतुष्ट हूँ। देवि! अपनी इच्छानुसार वर माँगिए। पुरन्दर! इस प्रकार मैंने सुरभि को वर माँगने के लिए प्रेरित किया ॥32-33॥ |
| |
| ‘O Sati-Sadhvi Devi! Why do you perform this severe penance? Beautiful! O great one! I am very satisfied with your penance. Devi! Ask for a boon as per your wish.’ Purandar! In this way I inspired Surabhi to ask for a boon. ॥ 32-33॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|