श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 85: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  13.85.22-23 
उपरिष्टात् ततोऽस्माकं वसन्त्येता: सदैव हि।
एवं ते कारणं शक्र निवासकृतमद्य वै॥ २२॥
गवां देवोपरिष्टाद्धि समाख्यातं शतक्रतो।
एता हि वरदत्ताश्च वरदाश्चापि वासव॥ २३॥
 
 
अनुवाद
इसीलिए ये गौएँ हम सब से ऊपर स्थान पर निवास करती हैं। शक्र! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने तुम्हें बताया है कि गौएँ देवताओं से भी ऊपर क्यों निवास करती हैं। शतक्रतु इन्द्र! इसके अतिरिक्त इन गौओं को वरदान भी प्राप्त हैं और प्रसन्न होने पर ये दूसरों को वरदान देने की शक्ति रखती हैं।॥ 22-23॥
 
‘That is why these cows reside in a place above all of us. Shakra! As per your question I have told you why cows reside in a place above even the gods. Shatakratu Indra! Apart from this these cows have also received boons and when pleased they have the power to grant boons to others.॥ 22-23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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