vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 84: लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना
»
श्लोक 10
श्लोक
13.84.10
इच्छामि चापि युष्मासु वस्तुं सर्वासु नित्यदा।
आगत्य प्रार्थये युष्मान् श्रीजुष्टा भवताथ वै॥ १०॥
अनुवाद
मैं आप सबके भीतर निवास करना चाहता हूँ और इसके लिए मैं स्वयं आपके पास आकर प्रार्थना करता हूँ। आप सब मेरी शरण में आकर समृद्ध हों॥10॥
I want to reside within all of you and for this I come to you myself and pray. May you all become prosperous by taking shelter in me.॥10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×