श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 83: गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  13.83.23 
करवीरवनै: फुल्लै: सहस्रावर्तसंवृतै:।
संतानकवनै: फुल्लैर्वृक्षैश्च समलंकृता:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
उस लोक में बहुत सी नदियाँ हैं, जिनके तटों पर पुष्पित कनेर के वृक्षों के वन, विकसित संतानक (विशेष कल्पवृक्ष) आदि वृक्षों के वन उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भाग में सहस्रों आवरों से घिरे रहते हैं॥23॥
 
There are many rivers in that world, on whose banks forests of blooming oleander trees and forests of developed Santanaka (special Kalpavriksha) and other trees enhance their beauty. Those trees and forests are surrounded by thousands of Aavars (a form of tree) in their root part.॥23॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas