श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 83: गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  13.83.17-18 
गावस्तेजो महद् दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते।
ये चैता: सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सरा:॥ १७॥
ते वै सुकृतिन: प्रोक्ता: सर्वदानप्रदाश्च ते।
गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ॥ १८॥
 
 
अनुवाद
गौएँ दिव्य और महान तेज वाली हैं। उनके दान की प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष अपनी कामनाओं का त्याग करके गौओं का दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहलाते हैं। वे सम्पूर्ण दानों के दाता माने जाते हैं। हे पापरहित शुकदेव! वे पुण्यमय गोलोक को प्राप्त होते हैं। 17-18॥
 
Cows are divine and of great brightness. His charity is praised. Those good men who give up their desires and donate cows are called virtuous souls. He is considered the giver of complete donations. Sinless Shukdev! They attain virtuous Goloka. 17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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