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श्लोक 13.8.29  |
पितेव पुत्रान् रक्षेथा ब्राह्मणान् धर्मचेतस:।
गृहे चैषामवेक्षेथा: किंस्विदस्तीति जीवनम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| राजा को चाहिए कि वह सदाचारी ब्राह्मणों की उसी प्रकार रक्षा करे जैसे पिता अपने पुत्रों की करता है। उसे सदैव इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि उनके घर में क्या-क्या भोजन उपलब्ध है और क्या नहीं है॥29॥ |
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| The king should protect the virtuous brahmins in the same way as a father protects his sons. He should always keep an eye on what is available in their house for sustenance and what is not.॥ 29॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टमोऽध्याय:॥ ८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दान - धर्मपर्वमें श्रेष्ठब्राह्मणोंकी प्रशंसा विषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/२ श्लोक हैं) |
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