श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 78: गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  13.78.23 
सन्ति लोकेऽश्रद्दधाना मनुष्या:
सन्ति क्षुद्रा राक्षसमानुषेषु।
एषामेतद् दीयमानं ह्यनिष्टं
ये नास्तिक्यं चाश्रयन्तेऽल्पपुण्या:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
संसार में बहुत से नास्तिक लोग हैं (जो इन सब बातों को नहीं मानते) और आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यों में भी बहुत से ऐसे नीच पुरुष हैं (जिन्हें ये बातें अच्छी नहीं लगतीं) तथा बहुत से पुण्यात्मा लोग नास्तिकता का आश्रय लेते हैं। उन्हें इसका उपदेश देना उचित नहीं है, प्रत्युत हानिप्रद है।॥23॥
 
‘There are many non-believers in the world (who do not believe in all these things) and among the people with demoniac nature, there are many such mean men (who do not like these things), many virtuous people take recourse to atheism. It is not desirable to preach this to them, on the contrary it is harmful.’॥23॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas