| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 78: गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम » श्लोक 13-14 |
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| | | | श्लोक 13.78.13-14  | या वै यूयं सोऽहमद्यैव भावो
युष्मान् दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता।
मनश्च्युता मन एवोपपन्ना:
संधुक्षध्वं सौम्यरूपोग्ररूपा:॥ १३॥
एवं तस्याग्रे पूर्वमर्धं वदेत
गवां दाता विधिवत् पूर्वदृष्ट:।
प्रतिब्रूयाच्छेषमर्धं द्विजाति:
प्रतिगृह्णन् वै गोप्रदाने विधिज्ञ:॥ १४॥ | | | | | | अनुवाद | | इसके बाद प्रथम दृष्टि में आये हुए दाता को चाहिए कि वह पहले निम्न अर्धश्लोक का विधिपूर्वक पाठ करे 'या वै युयं सोऽहमद्यैव भवो युष्मन् दत्वा चाहमात्मा प्रदता ।' - गौओं ! तुम्हारा जो रूप है, वह मेरे ही समान है - तुममें और हममें कोई भेद नहीं है; अतः आज तुम्हें भिक्षा देकर हमने अपना दान कर दिया है।' दाता के ऐसा कहने पर गोदान के विधान को जानने वाला ब्राह्मण शेष अर्धश्लोक का पाठ करे - 'मनश्च्युता मन अवोप्पन्नाः सन्धुक्षध्वं सौम्यरूपोग्ररूपाः।' - गौओं ! तुम शान्त और उग्र दोनों हो। अब दाता का तुम पर कोई वश नहीं रहा, अब तुम मेरे वश में आ गई हो; अतः इच्छित भोजन प्रदान करके मुझे और दाता को भी प्रसन्न करो ॥13-14॥ | | | | After this, the giver who has come in the first sight should first recite the following half verse in a systematic manner 'Ya Vai Yuyam So'hamadyaiva Bhavo Yushman Datva Chahamatma Pradata.' - Cows! The form you have is the same as mine - there is no difference between you and us; Therefore, by giving you alms today, we have donated ourselves.' When the donor says this, the Brahmin who knows the law of Godan should recite the remaining half verse - 'Manaschyuta man avoppannah sandhukshadhwam soumyarupograrupaah.' -Cows! You are both calm and fierce. Now the giver no longer has any control over you, now you have come under my control; Therefore, please me and the giver also by providing the desired food. 13-14॥ | | ✨ ai-generated | | |
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