श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 78: गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.78.10 
ऊर्जस्विन्य ऊर्जमेधाश्च यज्ञे
गर्भोऽमृतस्य जगतोऽस्य प्रतिष्ठा।
क्षिते रोह: प्रवह: शश्वदेव
प्राजापत्या: सर्वमित्यर्थवादा:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
(वे मन्त्र इस प्रकार हैं, गोदान के पश्चात् इनके द्वारा प्रार्थना करनी चाहिए-) 'गाय उत्साह से युक्त, बल और बुद्धि से युक्त, यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली अमृतमयी, भविष्य की उत्पत्ति का स्थान, इस जगत की प्रतिष्ठा (आश्रय), बैलों की सहायता से पृथ्वी पर फसल उगाने वाली, जगत के सनातन प्रवाह का प्रवर्तन करने वाली और प्रजापति की पुत्री हैं। यह सब गौओं की स्तुति है॥10॥
 
(Those mantras are as follows, one should pray through them after Godan -) 'Cows are full of enthusiasm, full of strength and intelligence, nectar used in Yagya, the place of origin of the future, the prestige (shelter) of this world, the one who cultivates crops on the earth with the help of bulls, the one who initiates the eternal flow of the world and is the daughter of Prajapati. This is all praise for the cows. 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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