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mahabharat 13.75.36: हे इन्द्र! गौ के प्रत्येक रोम में अनन्त लोक विद्यमान हैं। जो युद्ध में गौओं को जीतकर दान करता है, उसे वे गौएँ स्वयं ही बेचकर खरीदी गई गौओं के समान अनन्त फल प्रदान करती हैं - यह तुम्हें जानना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.75: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 75: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  13.75.36 
रोम्णि रोम्णि महाभाग लोकाश्चास्याऽक्षया: स्मृता:।
संग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गा: सम्प्रयच्छति।
आत्मविक्रयतुल्यास्ता: शाश्वता विद्धि कौशिक॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! गौ के प्रत्येक रोम में अनन्त लोक विद्यमान हैं। जो युद्ध में गौओं को जीतकर दान करता है, उसे वे गौएँ स्वयं ही बेचकर खरीदी गई गौओं के समान अनन्त फल प्रदान करती हैं - यह तुम्हें जानना चाहिए।
 
O mighty Indra! Every pore of a cow is believed to have eternal worlds. For the one who wins cows in a war and donates them, those cows themselves give him eternal fruits like the cows that are bought after selling them - you should know this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)