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mahabharat 13.75.27-28: हे इन्द्र! जो मनुष्य दिन में एक बार भोजन करता है, प्रतिदिन गौ दान करता है, सत्य में स्थित रहता है, गुरु की सेवा करता है, वेदों का अध्ययन करता है, हृदय में गौओं के प्रति भक्ति रखता है, गौओं को दान देने में प्रसन्न होता है और जन्म से ही गौओं का आदर करता है, उसे मिलने वाले फल का वर्णन सुनो॥ 27-28॥   |   mahabharat अध्याय 13.75: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 75: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  13.75.27-28 
नित्यं दद्यादेकभक्त: सदा च
सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च॥ २७॥
वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्च
नित्यं दत्त्वा योऽभिनन्देत गाश्च।
आजातितो यश्च गवां नमेत
इदं फलं शक्र निबोध तस्य॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! जो मनुष्य दिन में एक बार भोजन करता है, प्रतिदिन गौ दान करता है, सत्य में स्थित रहता है, गुरु की सेवा करता है, वेदों का अध्ययन करता है, हृदय में गौओं के प्रति भक्ति रखता है, गौओं को दान देने में प्रसन्न होता है और जन्म से ही गौओं का आदर करता है, उसे मिलने वाले फल का वर्णन सुनो॥ 27-28॥
 
Indra! Listen to the description of the reward that accrues to one who eats only once a day and donates cows every day, is established in truth, serves his Guru and studies the Vedas, has devotion for cows in his heart, is pleased to give away cows and pays respects to cows right from his birth.॥ 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)