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श्री महाभारत
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अध्याय 71: गोदानकी महिमा तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षासे पुण्यकी प्राप्ति
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श्लोक 12
श्लोक
13.71.12
घासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु य:।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम्॥ १२॥
अनुवाद
जो मनुष्य एक वर्ष तक प्रतिदिन अपना भोजन करने से पहले दूसरे की गायों को मुट्ठी भर घास खिलाता है, उसके व्रत से उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं ॥12॥
The fast of one who feeds a handful of grass to another's cows every day before eating his own food for a year, fulfils all his desires. ॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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