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mahabharat 13.70.29: जनेश्वर! रत्नों का दान भी महान पुण्य बताया गया है। जो ब्राह्मण दान में प्राप्त रत्नों को बेचकर उनसे यज्ञ करता है, उसे दान से भय नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 13.70: तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.70.29 
रत्नदानं च सुमहत् पुण्यमुक्तं जनाधिप।
यस्तान् विक्रीय यजते ब्राह्मणो ह्यभयंकरम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जनेश्वर! रत्नों का दान भी महान पुण्य बताया गया है। जो ब्राह्मण दान में प्राप्त रत्नों को बेचकर उनसे यज्ञ करता है, उसे दान से भय नहीं होता।
 
Janeshwar! Donation of gems is also said to be a great virtue. The Brahmin who sells the gems received as donation and performs a yajna using them, the gift is not fearful for him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)