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mahabharat 13.7.25-26h: जिस आचरण से मनुष्य अपने पिता को प्रसन्न करता है, उससे भगवान प्रजापति प्रसन्न होते हैं। जिस आचरण से वह अपनी माता को प्रसन्न करता है, उससे देवी पृथ्वी की भी पूजा होती है और जिस प्रकार वह अपने उपाध्याय को संतुष्ट करता है, उससे परब्रह्म की पूजा संपन्न होती है।   |   mahabharat अध्याय 13.7: कर्मोंके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 7: कर्मोंके फलका वर्णन  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  13.7.25-26h 
येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीत: प्रजापति:।
प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता॥ २५॥
येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम्।
 
 
अनुवाद
जिस आचरण से मनुष्य अपने पिता को प्रसन्न करता है, उससे भगवान प्रजापति प्रसन्न होते हैं। जिस आचरण से वह अपनी माता को प्रसन्न करता है, उससे देवी पृथ्वी की भी पूजा होती है और जिस प्रकार वह अपने उपाध्याय को संतुष्ट करता है, उससे परब्रह्म की पूजा संपन्न होती है।
 
The behaviour by which a man pleases his father pleases Lord Prajapati. The behaviour by which he pleases his mother also worships Goddess Earth and the way he satisfies his Upadhyaya, worship of the Supreme Brahman is accomplished by that. 25 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)