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mahabharat 13.68.65: इस प्रकार मैंने अन्न, तिल, भूमि और गौ दान के लाभ बताये हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  13.68.65 
इत्येतदन्नदानस्य तिलदानस्य चैव ह।
भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने अन्न, तिल, भूमि और गौ दान के लाभ बताये हैं।
 
In this way I have described the benefits of donating food, sesame, land and cow.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्याय:॥ ६६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६५ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)