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mahabharat 13.68.64: अन्नदाता यदि किसी कठिन परिस्थिति में भी हो, तो भी वह उस पर विजय प्राप्त कर लेता है। वह पापों से बच जाता है और भविष्य में होने वाले पाप कर्मों का भी नाश कर देता है ॥64॥   |   mahabharat अध्याय 13.68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.68.64 
सुकृच्छ्रामापदं प्राप्तश्चान्नद: पुरुषस्तरेत्।
पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
अन्नदाता यदि किसी कठिन परिस्थिति में भी हो, तो भी वह उस पर विजय प्राप्त कर लेता है। वह पापों से बच जाता है और भविष्य में होने वाले पाप कर्मों का भी नाश कर देता है ॥64॥
 
Even if a person who provides food is in a difficult situation, he overcomes it. He is saved from sins and also destroys the bad deeds that may happen in the future. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)