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mahabharat 13.68.61: राजा! मनुष्य को चाहिए कि वह प्रतिदिन शास्त्रविधि से देवताओं का पूजन करे और उन्हें भोग लगाए। मनुष्य जो अन्न खाता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं। ॥61॥   |   mahabharat अध्याय 13.68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  13.68.61 
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्योऽन्नं निवेदयेत्।
यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवता:॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
राजा! मनुष्य को चाहिए कि वह प्रतिदिन शास्त्रविधि से देवताओं का पूजन करे और उन्हें भोग लगाए। मनुष्य जो अन्न खाता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं। ॥61॥
 
King! Man should worship the gods daily in the manner prescribed by the scriptures and offer them food. Whatever food a man eats, his gods also consume the same food. ॥ 61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)