श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  13.68.42-43 
एकं गोब्राह्मणं तस्मात् प्रवदन्ति मनीषिण:।
रन्तिदेवस्य यज्ञे ता: पशुत्वेनोपकल्पिता:॥ ४२॥
अतश्चर्मण्वती राजन् गोचर्मभ्य: प्रवर्तिता।
पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ता: प्रदानायोपकल्पिता:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
इसीलिए बुद्धिमान लोग गौ और ब्राह्मण को एक ही मानते हैं। हे राजन! राजा रन्तिदेव के यज्ञ में वे पशुरूप में दान करने के लिए निश्चित की गई थीं; इसलिए गौओं के चर्मों से चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई। वे सभी गौएँ पशुत्व से मुक्त होकर दान करने के लिए निश्चित की गईं। 42-43।
 
That is why wise men consider cow and Brahmin to be one. O King! In the yajna of king Rantidev they were determined to be donated in the form of animals; hence the river named Charmanvati flowed from the skins of cows. All those cows were freed from animality and were determined to be donated. 42-43.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)