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mahabharat 13.67.16: इतना ही नहीं, भगवान अग्निदेव उस पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। उसके पशुओं को कभी कष्ट नहीं होता और वह युद्ध में विजयी होता है॥16॥   |   mahabharat अध्याय 13.67: सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 67: सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  13.67.16 
भगवांश्चापि सम्प्रीतो वह्निर्भवति नित्यश:।
न तं त्यजन्ति पशव: संग्रामे च जयत्यपि॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इतना ही नहीं, भगवान अग्निदेव उस पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। उसके पशुओं को कभी कष्ट नहीं होता और वह युद्ध में विजयी होता है॥16॥
 
Not only this, Lord Agnidev is always pleased with him. His animals are never harmed and he is victorious in the battle.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)