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mahabharat 13.64.58: जो लोग अपने स्वामी के हित के लिए युद्धभूमि में अपने शरीर का त्याग करते हैं, वे पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं; परंतु वे भी लोकों के स्वामी से आगे नहीं बढ़ पाते ॥ 58॥   |   mahabharat अध्याय 13.64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.64.58 
भर्तुर्नि:श्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हता:।
ब्रह्मलोकगता मुक्ता नातिक्रामन्ति भूमिदम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जो लोग अपने स्वामी के हित के लिए युद्धभूमि में अपने शरीर का त्याग करते हैं, वे पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं; परंतु वे भी लोकों के स्वामी से आगे नहीं बढ़ पाते ॥ 58॥
 
Those who sacrifice their bodies on the battlefield in the interest of their master's welfare, are freed from their sins and reach Brahmaloka; but they too are unable to progress beyond the Lord of the worlds. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)