श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.64.33 
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते।
तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जैसे चन्द्रमा की कलाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं, वैसे ही भूमिदान का फल भी दान की गई भूमि पर जितनी फसल होती है, उससे कई गुना बढ़ जाता है ॥ 33॥
 
Just as the phases of the moon increase with each passing day, similarly, the fruit of the donation of land increases as many times as crops are produced on the donated land. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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