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mahabharat 13.64.28: जो पृथ्वी का दान करता है, वह शान्तचित्त पुरुष पितृलोक में रहने वाले पितरों को तथा देवलोक से आने वाले देवताओं को भी तृप्त करता है। ॥28॥   |   mahabharat अध्याय 13.64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.64.28 
पितॄंश्च पितृलोकस्थान् देवलोकाच्च देवता:।
संतर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जो पृथ्वी का दान करता है, वह शान्तचित्त पुरुष पितृलोक में रहने वाले पितरों को तथा देवलोक से आने वाले देवताओं को भी तृप्त करता है। ॥28॥
 
He who gives away the earth, that calm-minded person satisfies the ancestors residing in Pitriloka (the world of ancestors) as well as the gods who come from Devloka (the world of gods). ॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)