श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.64.15 
नाभूमिपतिना भूमिरधिष्ठेया कथंचन।
न चापात्रेण वा ग्राह्या दत्तदाने न चाचरेत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो भूमि का स्वामी न हो, उसे उस पर अधिकार नहीं जताना चाहिए और अयोग्य व्यक्ति को भूमि दान स्वीकार नहीं करना चाहिए। दान की गई भूमि को अपने उपयोग में नहीं लाना चाहिए ॥15॥
 
One who is not the owner of a land should not claim any right over it and an unworthy person should not accept land donation. The land which has been donated should not be used for one's own use. ॥15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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