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mahabharat 13.61.8: जो मनुष्य अपनी प्रिय वस्तुओं का दान दूसरों को देता है और उनकी प्रिय वस्तुएँ करता है, वह सदैव प्रिय वस्तुएँ ही प्राप्त करता है और इस लोक में तथा परलोक में भी सभी प्राणियों का प्रिय होता है। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 13.61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.61.8 
प्रियाणि लभते नित्यं प्रियद: प्रियकृत् तथा।
प्रियो भवति भूतानामिह चैव परत्र च॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपनी प्रिय वस्तुओं का दान दूसरों को देता है और उनकी प्रिय वस्तुएँ करता है, वह सदैव प्रिय वस्तुएँ ही प्राप्त करता है और इस लोक में तथा परलोक में भी सभी प्राणियों का प्रिय होता है। ॥8॥
 
He who gives charity of his favourite things to others and does their favourite work always receives only the favourite things and is loved by all creatures in this world as well as the next. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)