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mahabharat 13.61.37: पिताजी! मैं ब्राह्मणों से जितना प्रेम करता हूँ, उतना अपने पिता से, आपसे, अपने दादा से, इस शरीर से और यहाँ तक कि इस जीवन से भी नहीं करता।   |   mahabharat अध्याय 13.61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.61.37 
न मे पिता प्रियतरो न त्वं तात तथा प्रिय:।
न मे पितु: पिता राजन् न चात्मा न च जीवितम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! मैं ब्राह्मणों से जितना प्रेम करता हूँ, उतना अपने पिता से, आपसे, अपने दादा से, इस शरीर से और यहाँ तक कि इस जीवन से भी नहीं करता।
 
Father! As much as I love Brahmins, I do not love my father, you, my grandfather, this body and even this life as much.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)