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mahabharat 13.61.17-18: हे युद्धविजयी युधिष्ठिर! जो तुम विद्वान्, तपस्वी, धनवानों का आश्रय न लेने वाले, अध्ययन और तप को गुप्त रखने वाले, कठोर व्रतों का पालन करने में तत्पर, शुद्ध, संयमी और अपनी स्त्री में संतुष्ट रहने वाले ब्राह्मणों के लिए करते हो, वही संसार में तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगा॥17-18॥   |   mahabharat अध्याय 13.61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.61.17-18 
विद्यास्नाता व्रतस्नाता ये व्यपाश्रित्य जीविन:।
गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणा: संशितव्रता:॥ १७॥
तेषु शुद्धेषु दान्तेषु स्वदारपरितोषिषु।
यत् करिष्यसि कल्याणं तत् ते लोके युधाम्पते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे युद्धविजयी युधिष्ठिर! जो तुम विद्वान्, तपस्वी, धनवानों का आश्रय न लेने वाले, अध्ययन और तप को गुप्त रखने वाले, कठोर व्रतों का पालन करने में तत्पर, शुद्ध, संयमी और अपनी स्त्री में संतुष्ट रहने वाले ब्राह्मणों के लिए करते हो, वही संसार में तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगा॥17-18॥
 
Yudhishthira, the victor of war! Whatever you do for the learned, the observant, the living without taking shelter of any rich man, the Brahmins who keep their studies and austerities secret, who are ready to observe strict vows, who are pure, self-controlled and satisfied with their own wives, that will be beneficial for you in the world.॥17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)