श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 60: जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.60.14 
तडागं सुकृतं यस्य वसन्ते तु महाश्रयम्।
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं स समुपाश्नुते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जिसका खोदा हुआ तालाब वसन्त ऋतु तक अपने अन्दर जल रहने के कारण प्यासे प्राणियों के लिए उत्तम आश्रय बना रहता है, उसे 'अतिरात्र' यज्ञ का फल मिलता है ॥14॥
 
The one whose dug pond remains a great shelter for thirsty creatures due to keeping water inside it till the spring season, gets the result of 'Atiratra' Yagya. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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