श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक d1-d2
 
 
श्लोक  13.6.d1-d2 
ब्रह्मोवाच
(बीजतो ह्यङ्कुरोत्पत्तिरङ्कुरात् पर्णसम्भव:।
पर्णान्नाला: प्रसूयन्ते नालात् स्कन्ध: प्रवर्तते॥
स्कन्धात् प्रवर्तते पुष्पं पुष्पान्निर्वर्तते फलम्।
फलान्निर्वर्त्यते बीजं बीजं नाफलमुच्यते॥ )
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले- मुनि! बीज से अंकुर उत्पन्न होता है, अंकुर से पत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। पत्तियों से नाल उत्पन्न होती है, नाल से तने और शाखाएँ उत्पन्न होती हैं। उनसे पुष्प उत्पन्न होता है। पुष्प से फल उत्पन्न होता है और फल से बीज उत्पन्न होता है। बीज को कभी भी फलहीन नहीं कहा गया है।
 
Brahmaji said- Muni! A sprout is born from a seed, leaves are born from the sprout. From the leaves, a cord is born, from the cord, stems and branches. From them, a flower emerges. From the flower, a fruit is born and from the fruit, a seed is born and a seed has never been said to be fruitless.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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