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श्लोक 13.6.8  |
क्षेत्रं पुरुषकारस्तु दैवं बीजमुदाहृतम्।
क्षेत्रबीजसमायोगात् तत: सस्यं समृद्ध्यते॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| पुरुषार्थ ही क्षेत्र है और भाग्य ही बीज है। क्षेत्र और बीज के संयोग से ही अन्न उत्पन्न होता है ॥8॥ |
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| Purusharth is the field and destiny is the seed. It is from the conjunction of field and seed that grains are produced. ॥ 8॥ |
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