Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.6.47: इस संसार में, उद्योगहीन मनुष्य कभी उन्नति करते नहीं देखा जाता। ईश्वर में इतनी शक्ति नहीं कि उसे कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लगा सके। जैसे शिष्य अपने गुरु के आगे-आगे चलता है, वैसे ही ईश्वर स्वयं उसके पुरुषार्थ का नेतृत्व करते हुए उसके पीछे-पीछे चलते हैं। संचित पुरुषार्थ ईश्वर को जहाँ चाहे वहाँ ले जाता है ॥47॥ | mahabharat अध्याय 13.6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं
व्यपनयति विमार्गं नास्ति दैवे प्रभुत्वम्।
गुरुमिव कृतमग्रॺं कर्म संयाति दैवं
नयति पुरुषकार: संचितस्तत्र तत्र॥ ४७॥
अनुवाद
इस संसार में, उद्योगहीन मनुष्य कभी उन्नति करते नहीं देखा जाता। ईश्वर में इतनी शक्ति नहीं कि उसे कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लगा सके। जैसे शिष्य अपने गुरु के आगे-आगे चलता है, वैसे ही ईश्वर स्वयं उसके पुरुषार्थ का नेतृत्व करते हुए उसके पीछे-पीछे चलते हैं। संचित पुरुषार्थ ईश्वर को जहाँ चाहे वहाँ ले जाता है ॥47॥
In this world, a man without industry is never seen to prosper. God does not have the power to remove him from the wrong path and put him on the right path. Just as a disciple walks ahead of his Guru, similarly God himself walks behind him by leading his efforts. The accumulated efforts take God wherever it wants. ॥ 47 ॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥