Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.6.45: उद्योगहीन मनुष्य बहुत सारा धन, सब प्रकार के सुख और स्त्रियाँ प्राप्त होने पर भी उनका उपभोग नहीं कर सकता; किन्तु जो महान बुद्धि वाला मनुष्य सदैव उद्योग में लगा रहता है, वह देवताओं द्वारा सुरक्षित और गड़ा हुआ धन भी प्राप्त कर लेता है ॥ 45॥ | mahabharat अध्याय 13.6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान् स्त्रियो वा
पुरुष इह न शक्त: कर्महीनो हि भोक्तुम्।
सुनिहितमपि चार्थं दैवतै रक्ष्यमाणं
पुरुष इह महात्मा प्राप्नुते नित्ययुक्त:॥ ४५॥
अनुवाद
उद्योगहीन मनुष्य बहुत सारा धन, सब प्रकार के सुख और स्त्रियाँ प्राप्त होने पर भी उनका उपभोग नहीं कर सकता; किन्तु जो महान बुद्धि वाला मनुष्य सदैव उद्योग में लगा रहता है, वह देवताओं द्वारा सुरक्षित और गड़ा हुआ धन भी प्राप्त कर लेता है ॥ 45॥
A man without industry cannot enjoy a large store of wealth, all kinds of pleasures and women, even if he has them; however, a man of great mind who is always engaged in industry obtains even the wealth that is kept safe and buried by the gods. ॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥