श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.6.41 
तपोनियमसंयुक्ता मुनय: संशितव्रता:।
किं ते दैवबलात् शापमुत्सृजन्ते न कर्मणा॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
क्या कठोर तप और अनुशासन का पालन करने वाले ऋषिगण अपने प्रयत्नों से नहीं, अपितु ईश्वर की शक्ति से किसी को शाप देते हैं? ॥41॥
 
Do the sages who follow a strict vow of austerity and discipline curse someone by the power of God and not by their efforts? ॥41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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