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श्लोक 13.6.28  |
कृतं चाप्यकृतं किंचित् कृते कर्मणि सिद्ध्यति।
सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथार्थं प्रपद्यते॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| प्रबल पुरुषार्थ से पूर्व किया गया कोई भी कर्म मानो किया ही न गया हो और केवल वही प्रबल कर्म ही सम्पन्न होकर अपना फल देता है। इस प्रकार पुण्य या पाप कर्म अपना वास्तविक फल नहीं दे पाते॥28॥ |
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| Any deed done before making strong efforts becomes as if it was not done and only that strong deed is accomplished and gives its result. In this way, virtuous or sinful deeds are not able to give their true results.॥ 28॥ |
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