श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.6.27 
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।
आत्मैव ह्यात्मन: साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च॥ २७॥
 
 
अनुवाद
आत्मा ही हमारा मित्र है, आत्मा ही हमारा शत्रु है और आत्मा ही हमारे कर्म और अकर्म का साक्षी है ॥27॥
 
The soul itself is our friend, the soul itself is our enemy and the soul itself is the witness of our actions and inaction. ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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