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mahabharat 13.6.25: ऋषियों और देवताओं में सदैव कलह होती रहती है (देवता ऋषियों की तपस्या में विघ्न डालते हैं और ऋषि अपने तप बल से देवताओं को विचलित कर देते हैं)। फिर भी, भगवान की सहायता के बिना, केवल वचनों से कौन सुख या दुःख प्राप्त कर सकता है? क्योंकि भगवान ही प्रत्येक कर्म का मूल हैं॥25॥   |   mahabharat अध्याय 13.6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.6.25 
ऋषीणां देवतानां च सदा भवति विग्रह:।
कस्य वाचा ह्यदैवं स्याद् यतो दैवं प्रवर्तते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों और देवताओं में सदैव कलह होती रहती है (देवता ऋषियों की तपस्या में विघ्न डालते हैं और ऋषि अपने तप बल से देवताओं को विचलित कर देते हैं)। फिर भी, भगवान की सहायता के बिना, केवल वचनों से कौन सुख या दुःख प्राप्त कर सकता है? क्योंकि भगवान ही प्रत्येक कर्म का मूल हैं॥25॥
 
There is always strife between sages and gods (Gods create obstacles in the penance of sages and sages displace the gods by their austerity power). Yet, without the help of God, who can get happiness or sorrow by mere words? Because God is the root of every action.॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)