श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.6.17 
नादातारं भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम्।
नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
न तो दान न देने वाला कंजूस, न नपुंसक, न निष्क्रिय, न काम से जी चुराने वाला, न साहसहीन, न तप न करने वाला, धन प्राप्त करता है ॥17॥
 
Neither a miser who does not give charity, nor an impotent person, nor an inactive person, nor one who shirks work, nor a person lacking in courage, nor one who does not perform austerities, gets wealth. ॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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