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mahabharat 13.6.12: मनुष्य तप से सौन्दर्य, सौभाग्य और नाना प्रकार के रत्न प्राप्त करता है। इसी प्रकार कर्म से सब कुछ प्राप्त हो सकता है; परन्तु जो मनुष्य भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, उसे कुछ भी नहीं मिलता॥12॥   |   mahabharat अध्याय 13.6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.6.12 
तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि च।
प्राप्यते कर्मणा सर्वं न दैवादकृतात्मना॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य तप से सौन्दर्य, सौभाग्य और नाना प्रकार के रत्न प्राप्त करता है। इसी प्रकार कर्म से सब कुछ प्राप्त हो सकता है; परन्तु जो मनुष्य भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, उसे कुछ भी नहीं मिलता॥12॥
 
A man attains beauty, good fortune and various kinds of gems through penance. In this way, everything can be obtained by action; but a person who sits idle relying on fate gets nothing.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)