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mahabharat 13.6.11: जो पुरुषार्थी है, वह अपने प्रारब्ध के अनुसार सर्वत्र सम्मान पाता है; परंतु जो निष्क्रिय है, वह सम्मान खो देता है और घाव पर नमक छिड़कने के समान असह्य पीड़ा भोगता है ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 13.6: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.6.11 
कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यसंयुताम्।
अकृती लभते भ्रष्ट: क्षते क्षारावसेचनम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुषार्थी है, वह अपने प्रारब्ध के अनुसार सर्वत्र सम्मान पाता है; परंतु जो निष्क्रिय है, वह सम्मान खो देता है और घाव पर नमक छिड़कने के समान असह्य पीड़ा भोगता है ॥11॥
 
A man who makes efforts gets respect everywhere according to his destiny; but a person who is inactive loses respect and suffers unbearable pain, just like salt is sprinkled on a wound. ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)