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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 59: विविध प्रकारके तप और दानोंका फल  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  13.59.44 
ततस्तु पाण्डवा: सर्वे द्रौपदी च यशस्विनी।
युधिष्ठिरस्य तद् वाक्यं बाढमित्यभ्यपूजयन्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तब समस्त पाण्डवों तथा यशस्वी द्रौपदी ने युधिष्ठिर के वचनों का सम्मान करते हुए कहा, 'बहुत अच्छा।'
 
Then all the Pandavas and the illustrious Draupadi respected Yudhishthira's words by saying, 'Very good.'
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानध र्मपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)