श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 58: च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  13.58.15-16 
भीष्म उवाच
कुशिकस्तु मुनेर्वाक्यं च्यवनस्य महात्मन:॥ १५॥
श्रुत्वा हृष्टोऽभवद् राजा वाक्यं चेदमुवाच ह।
एवमस्त्विति धर्मात्मा तदा भरतसत्तम॥ १६॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - भरत श्रेष्ठ है! महात्मा च्यवन मुनिका के ये वचन सुनकर धर्मात्मा राजा कुशिक अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले - 'भगवन्! मुझे ऐसी ही आशा है।'
 
Bhishmaji says – Bharat is the best! Hearing these words of Mahatma Chyavan Munika, the virtuous King Kushik became very happy and said, 'Lord! I hope so'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)