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mahabharat 13.57.30: पिताजी! तपस्या और ब्राह्मणत्व के संबंध में आपने जो कहा, वह बिल्कुल सही है। वास्तव में ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। ब्राह्मण होकर भी ऋषि होना और ऋषि होकर भी तपस्वी होना तो और भी कठिन है। 30।   |   mahabharat अध्याय 13.57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.57.30 
एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं ब्राह्मण्यं तात दुर्लभम्।
ब्राह्मणे सति चर्षित्वमृषित्वे च तपस्विता॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! तपस्या और ब्राह्मणत्व के संबंध में आपने जो कहा, वह बिल्कुल सही है। वास्तव में ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। ब्राह्मण होकर भी ऋषि होना और ऋषि होकर भी तपस्वी होना तो और भी कठिन है। 30।
 
Father! The expressions you were making regarding tapasya and brahminhood are absolutely correct. In reality, brahminhood is rare. It is even more difficult to be a sage despite being a brahmin and to be an ascetic despite being a sage. 30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)