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mahabharat 13.57.24-26h: फिर जब मैं तुम्हारा धन लूटने लगा, तब भी तुम्हें क्रोध नहीं आया। इन सब बातों से मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हुआ। हे राजन! हे मनुष्यों के स्वामी! इसलिए मैंने तुम्हें तुम्हारी पत्नी सहित संतुष्ट करने के लिए इस वन में स्वर्ग दिखाया है। पुनः इन सब बातों का उद्देश्य तुम्हें प्रसन्न करना ही था, इस बात को तुम अच्छी तरह जान लो।   |   mahabharat अध्याय 13.57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना  »  श्लोक 24-26h
 
 
श्लोक  13.57.24-26h 
धनोत्सर्गेऽपि च कृते न त्वां क्रोध: प्रधर्षयत्॥ २४॥
तत: प्रीतेन ते राजन् पुनरेतत् कृतं तव।
सभार्यस्य वनं भूयस्तद् विद्धि मनुजाधिप॥ २५॥
प्रीत्यर्थं तव चैतन्मे स्वर्गसंदर्शनं कृतम्।
 
 
अनुवाद
फिर जब मैं तुम्हारा धन लूटने लगा, तब भी तुम्हें क्रोध नहीं आया। इन सब बातों से मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हुआ। हे राजन! हे मनुष्यों के स्वामी! इसलिए मैंने तुम्हें तुम्हारी पत्नी सहित संतुष्ट करने के लिए इस वन में स्वर्ग दिखाया है। पुनः इन सब बातों का उद्देश्य तुम्हें प्रसन्न करना ही था, इस बात को तुम अच्छी तरह जान लो।
 
Then when I started looting your wealth, even then you did not get angry. All these things made me very happy with you. O King! O lord of human beings! Therefore, to satisfy you along with your wife, I have shown you heaven in this forest. Again, the purpose of doing all these things was to please you, know this thing very well. 24-25 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)