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mahabharat 13.57.20: हे मनुष्यों के स्वामी! मैंने सोचा था कि तुम दोनों भूख या परिश्रम से थके होने के कारण मेरी निन्दा करोगे। इसी उद्देश्य से मैंने तुम्हें भूखा रखा और कष्ट दिया।   |   mahabharat अध्याय 13.57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.57.20 
क्षुधितौ मामसूयेथां श्रमाद् वेति नराधिप।
एवं बुद्धिं समास्थाय कर्शितौ वां क्षुधा मया॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! मैंने सोचा था कि तुम दोनों भूख या परिश्रम से थके होने के कारण मेरी निन्दा करोगे। इसी उद्देश्य से मैंने तुम्हें भूखा रखा और कष्ट दिया।
 
O Lord of men! I had thought that both of you would criticize me because of hunger or being tired from hard work. For this very purpose I kept you hungry and caused you pain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)