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mahabharat 13.57.17: हे राजनश्रेष्ठ! जब तुमने मुझे और मेरी पत्नी को सोते समय नहीं जगाया, तब मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हुआ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 13.57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 57: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.57.17 
यदा त्वया सभार्येण संसुप्तो न प्रबोधित:।
अहं तदैव ते प्रीतो मनसा राजसत्तम॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! जब तुमने मुझे और मेरी पत्नी को सोते समय नहीं जगाया, तब मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हुआ॥17॥
 
O best of kings! When you did not wake me and my wife while I was sleeping, I was very pleased with you. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)