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mahabharat 13.56.36-37h: हे वक्ता श्रेष्ठ पुत्र! तुमने मेरी बहुत अच्छी तरह से पूजा की है। तुमने कोई छोटा-सा भी पाप नहीं किया है। 36 1/2   |   mahabharat अध्याय 13.56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  13.56.36-37h 
सम्यगाराधित: पुत्र त्वया प्रवदतां वर॥ ३६॥
न हि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते।
 
 
अनुवाद
हे वक्ता श्रेष्ठ पुत्र! तुमने मेरी बहुत अच्छी तरह से पूजा की है। तुमने कोई छोटा-सा भी पाप नहीं किया है। 36 1/2
 
O best of speakers, son! You have worshipped me very well. You have not committed even the smallest or the tiniest of sins. 36 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)