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mahabharat 13.56.34-35h: भरतवंशी राजा! तत्पश्चात भृगुपुत्र च्यवन मुनि ने स्वस्थ होकर राजा को अपने मधुर एवं कोमल वचनों से संतुष्ट करते हुए कहा - ॥34 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  13.56.34-35h 
तत: प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नृपते नृपम्॥ ३४॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत।
 
 
अनुवाद
भरतवंशी राजा! तत्पश्चात भृगुपुत्र च्यवन मुनि ने स्वस्थ होकर राजा को अपने मधुर एवं कोमल वचनों से संतुष्ट करते हुए कहा - ॥34 1/2॥
 
Bharatvanshi king! After that, Bhrigu's son Chyavana Muni, after recovering, satisfied the king with his sweet and soft words and said - ॥ 34 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)