श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  13.56.22-23 
एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम्।
क्षणेन तद् वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणा:॥ २२॥
गन्धर्वा: पादपाश्चैव सर्वमन्तरधीयत।
नि:शब्दमभवच्चापि गंगाकूलं पुनर्नृप॥ २३॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवन ने अपनी योगशक्ति से राजा कुशिक को मोहित कर लिया। क्षण भर में ही वह वन, अप्सराओं का समूह, गन्धर्व और वृक्ष, सब लुप्त हो गए। हे मनुष्यों! गंगा का वह तट पुनः शांत हो गया॥ 22-23॥
 
In this way, Brahmarshi Chyavana mesmerized King Kushik with his yogic powers. In a single moment, the forest, the group of Apsaras, the Gandharvas and the trees, all disappeared. O Lord of men! That bank of the Ganga again became silent.॥ 22-23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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