श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  13.55.70 
अथाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन-
स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत्।
मनीषया बहुविधरत्नभूषितं
ससर्ज यन्न पुरि शतक्रतोरपि॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
यहाँ भृगुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले और तप के धनी महर्षि च्यवन ने अपने दृढ़ संकल्प से गंगा के तट पर स्थित तपोवन को नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित करके उसे समृद्ध और सुन्दर बना दिया था। ऐसा सुखद विधान तो इन्द्रपुरी अमरावती में भी नहीं था॥70॥
 
Here, Maharshi Chyavan, who increased the fame of Bhrigukul and was rich in penance, made Tapovan on the banks of Ganga prosperous and beautiful by beautifying it with different types of gems through his determination. Such a pleasant law was not there even in Indrapuri Amravati. 70॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)