श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  13.55.37 
नोत्सार्या: पथिका: केचित् तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम्।
ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
‘रास्ते से कोई भी यात्री न हटे, मैं उन सबको धन दूँगा। मार्ग में जो भी ब्राह्मण मुझसे माँगेगा, मैं उसे वही दूँगा।’ 37.
 
‘No traveller should be removed from the road, I will give them all money. Whatever Brahmin on the road asks me for, I will give him that very thing. 37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)