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mahabharat 13.55.3: वह विनम्र भाव से नगर में प्रवेश कर गया और किसी से कुछ नहीं बोला। वह मन ही मन च्यवन ऋषि के चरित्र का चिंतन करने लगा।   |   mahabharat अध्याय 13.55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.55.3 
स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किंचन।
तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वह विनम्र भाव से नगर में प्रवेश कर गया और किसी से कुछ नहीं बोला। वह मन ही मन च्यवन ऋषि के चरित्र का चिंतन करने लगा।
 
He entered the city with a humble attitude and did not speak to anyone. He only started thinking about the character of the sage Chyavana in his mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)